हठयोग प्रदीपिका में उत्तान कूर्मासन: गहरी विश्रांति, प्रत्याहार और तंत्रिका तंत्र के लाभ
शास्त्रीय ग्रंथ Hatha Yoga Pradipika, जिसे Swami Swatmarama ने रचा,
उसमें उत्तान कूर्मासन को स्थिरता और अंतर्मुखता का प्रतीक बताया गया
है। “कूर्म” अर्थात् कछुआ — जो अपने अंगों को भीतर समेट लेता है। योग में यह प्रत्याहार (इंद्रियों की अंतर्मुखता) का प्रतीक है।
यह आसन केवल शारीरिक झुकाव नहीं,
बल्कि मानसिक शांति और आंतरिक स्थिरता का अभ्यास
है।
संस्कृत संदर्भ (सार रूप)
देवनागरी:
कूर्मवत् स्थिरभावेन शरीरं संनिवेश्य च ।
उत्तानकूर्मकं नाम सर्वदुःखनिवारणम् ॥
अर्थ:
कछुए के समान स्थिर भाव से शरीर को स्थापित करना
उत्तान कूर्मासन कहलाता है, जो
दुःखों का निवारण करता है।
पारंपरिक विधि
- पद्मासन में बैठें।
- धीरे-धीरे आगे की ओर झुकें।
- हाथों को पीछे या पैरों के नीचे से आगे
बढ़ाएँ।
- माथा या ठोड़ी भूमि की ओर लाएँ।
- श्वास को धीमा और सहज रखें।
- ध्यान को भीतर की ओर केंद्रित करें।
पारंपरिक लाभ
- प्रत्याहार की सिद्धि
- मानसिक शांति
- प्राण की स्थिरता
- चंचलता का शमन
- ध्यान के लिए तैयारी
यह आसन बाह्य संसार से भीतर की
यात्रा का प्रतीक है।
वैज्ञानिक एवं तंत्रिका तंत्र के लाभ
- पैरासिम्पेथेटिक तंत्र की सक्रियता
(विश्रांति प्रतिक्रिया)
- तनाव हार्मोन में कमी
- पीठ की मांसपेशियों में शिथिलता
- भावनात्मक संतुलन
- एकाग्रता में वृद्धि
आधुनिक दृष्टिकोण से यह आसन तंत्रिका
तंत्र को संतुलित कर गहरी विश्रांति प्रदान करता है।
सावधानियाँ
- गंभीर कमर दर्द में अभ्यास न करें।
- घुटनों की समस्या होने पर पद्मासन से बचें।
- अभ्यास धीरे और सजगता से करें।
समन्वित चिंतन
उत्तान कूर्मासन हमें सिखाता है कि
सच्ची शक्ति भीतर की शांति में निहित है। जब इंद्रियाँ शांत होती हैं, तब मन स्थिर होता है।
आज के व्यस्त जीवन में यह आसन आंतरिक
संतुलन और मानसिक विश्रांति का माध्यम बन सकता है।


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